अतिथि तुम कब जाओगे ?
जब बच्चे थे तब भी दीवाली की सफाई करते थे और अब, जब हम बूढ़े हो रहे हैं तब भी सफाई कर रहे हैं। 50 साल में क्या बदला ? पहले हम ढेर सारा सामान निकालते थे, कुछ खुद ही वापस ले लेते थे, कुछ भाई लोग ले जाते थे और जब थोड़ा बचता था तो वह कचरे के डिब्बे में जाता था। जैसे ही पिताजी की नजर कचरे के डिब्बे में जाती थी, वह सूतली उठा लेते थे और कहते थे कि यह तो बड़े काम की है, इसे कैसे फेंक दिया !!
आज भी यही हो रहा है, पहले केवल धूल ही कचरे में बच पाती थी और आज थोड़ी थैलियां और जुड़ गयी हैं। धीरे-धीरे कर के एक-एक चीज वापस अपने ठिकाने बिराज जाती हैं। कोई ना कोई इन की तरफदारी करने आ ही जाता है। इस बार पुराने कपड़ों का ढेर निकाल डाला लेकिन फिकने में नहीं आ रहा। फेंके भी तो कहाँ ? फेंकते समय हर चीज काम की लगती है और अगले साल फिर वही चीज फेंकने वाली लिस्ट में होती है, बरसों बरस यह क्रम चलता ही रहता है और इन्हें कोई ना कोई प्रशान्त भूषण सा वकील मिल ही जाता है। देश का कचरा देश में ही स्थापित हो जाता है।
आज एक अलमारी खोली गयी, सामान ढूंसकर भरा था। यह कहाँ से आया ? बिजली के कुछ बोर्ड बदलवाए गये थे और पुरानों को अल्मारी में बकायदा स्थान दे दिया गया था। जैसे ये सीनियर सिटिजन हों और उन के लिये एक कोठरी बना दी जाये !! जब पुराने को बदल ही दिया गया है तो उसे सुरक्षित म्यूजियम बना कर रखने की क्या आवश्यकता है ? लेकिन हमारी मानसिकता में फेंकना तो मानो गुनाह है। मैंने अल्मारी खाली कर दी लेकिन वह सामान किसी दूसरे स्टोर में जगह पा ही जाएगा, यह निश्चित है।
अच्छा कुछ सामान तो कबाड़ी भी नहीं खऱीदता, वह कहता है कि किसी काम का नहीं। लेकिन फिर भी हमारे यहाँ बिराजमान है। मेरी सबसे बड़ा समस्या है मोमण्टो। कबाड़ी कहता है कि नहीं ले जाता, अल्मारी कहती है कि किस-किस को समेटूं और किस-किस को याद रखूं। देश में भी ना न जाने कैसी-कैसी प्रथा बन जाती है! देने वाले के पैसे खर्च होते हैं और लेने वाले की समस्या बन जाते हैं। उपहार देना फैशन से भी बढ़कर आवश्यकता बन गया है, उपहार के बदले फिर वापसी में उपहार !! कई बार तो लगता है कि हम सामान के बीच किसी खांचे में रहते हैं। जैसे सारे शऱीर में हड्डियों का जाल और बेचारा नन्हा सा दिल एक कोने में चुपचाप धड़कता रहता है। 18 बाय 22 के कमरे में हम सामानों से घिरे हैं और हमारे लिये बामुश्किल 5-6 फीट की जगह बची है।

अल्मारी में सामान और पुस्तकें बढ़ती जाती हैं। दीवाली पर जब कुछ जगह बनाने की सोचते हैं तो कुछ किताबें ही फालतू के रिश्तों जैसे बाहर हो जाती हैं। बिग-बॉस के घर में बेचारी कविता की किताबों के कोई जगह नहीं होती। पत्रिकाएं तो महीने भर भी अपनी जगह स्थिर नहीं रख पाती, फिर चाहे उन के पन्नों में हम ही क्यों ना बैठे हों। यह तो भला हो कैमरे के डिजिटल होने का, नहीं तो ना जाने कितने नेगेटिव पड़े-पड़े अपने कालेपन को धोने को बेताब रहते। अब हम लेपटॉप को भरते रहते हैं। लेपटॉप की जगह दुनिया के एक कोने में कहीं सुरक्षित है, जिस का हमें भी नहीं पता है। कभी दुनिया नष्ट होगी और फिर आबाद होगी तो यह भूतिया महल लोगों के लिये आश्चर्य का कारण बनेगा !!
सारे दुनिया के डेटा यहाँ भरे हैं, लोग इस पहेली को हल करते-करते ना जाने कितनी सदियां निकाल देंगे। इस इलेक्ट्रोनिक कचरे की सोचकर तो मुझे कुछ राहत सी मिली है, मेरे पास तो एकाध अल्मारी में ही उछल-कूद मचाए है लेकिन दुनिया में ना जाने कितने देश की जगह ये लील रहे हैं! हम कहते हैं कि हर चीज नश्वर है, जो आया है वह जाएगा लेकिन इन्हें कैसे भस्मीभूत करें, समस्या बने हुए हैं !! लगता है अलादीन का चिराग है, बोतल से निकलते ही समस्या कर देता है। कहाँ से लाएं वह बोतल, जिस में कचरे को भर दें और ढक्कन लगाकर समुद्र में फेंक दें।
हे !! फालतू सामानों, तुम्हें हम कचरा कहते हैं, हमारे घर से, हमारे मन से निकलने का जतन करो। हम ने यह मकान अपने लिये बनवाया था और तुम ने इस पर अधिकार जमा लिया है। तुम क्यों उस अतिथि की तरह हो गये हो जिसे कहना पड़ता है – अतिथि तुम कब जाओगे ? लेकिन तुम तो हमारे मन में बस गये हो, तुम्हें कैसे निकालें ? मैं निष्ठुर हो जाता हूँ और बंगलादेशी समझकर बाहर कर देती हूँ लेकिन तभी कोई ना कोई प्रशान्त भूषण को अपने साथ ले आता है और स्टे लग जाता है। बचा ले मुझे !!














