Govardhan puja : गोवर्धन पूजा (अन्न कूट)विधि,सामग्री और कथा के बारे में…जाने

अन्नकूट पूजा (गोवर्धन पूजा) में भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगाकर प्रकृति और अन्न का आभार व्यक्त किया जाता है। यहां अन्नकूट पूजा की विधि दी गई है:

अन्नकूट पूजा की विधि जानकारी

1. साफ-सफाई और स्थान चयन: सबसे पहले पूजा स्थल की सफाई करें। घर के आंगन या किसी पवित्र स्थान पर गोवर्धन पूजा के लिए तैयारी करें।

2. गोवर्धन पर्वत का निर्माण: पूजा स्थल पर गोबर से एक छोटा गोवर्धन पर्वत बनाएं। इसे पर्वत के आकार में सजाएं। गोबर के पर्वत को रंगीन फूलों और पत्तियों से सजाएं।

3. भगवान की मूर्तियाँ स्थापित करें: गोवर्धन पूजा के स्थल पर भगवान कृष्ण , गोवर्धन पर्वत, गाय, और अन्य ग्वालों की मूर्तियाँ या चित्र रखें।

4. मंत्रोचार और पूजन सामग्री: पूजा के लिए जल, अक्षत ( चावल), पुष्प, दीपक, धूप, और कुमकुम तैयार रखें। भगवान कृष्ण की पूजा करते समय निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण करें:

ॐ गोवर्धनधाराय नमः
ॐ श्रीकृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने नमः

5. अन्नकूट का भोग तैयार करें: विभिन्न प्रकार की पकवान, मिठाइयाँ, चावल, दाल, सब्जियाँ , और अन्य भोजन बनाकर भगवान को अर्पित करें। इसे “अन्नकूट” कहा जाता है, और यह अन्न का पर्वत बनाकर भगवान को समर्पित किया जाता है।

6. आरती और भोग लगाना: भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की आरती करें। फिर सभी प्रकार के पकवान , मिठाइयाँ और भोजन भगवान को अर्पित करें।आरती के बाद भोग प्रसाद के रूप में सभी भक्तों में वितरित किया जाता है।

7. गोवर्धन परिक्रमा: कुछ लोग पूजा के बाद गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक परिक्रमा भी करते हैं। यह परिक्रमा भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है।

8. प्रसाद वितरण: पूजा के बाद सभी में प्रसाद वितरण करें और अन्नकूट का महत्त्व सभी के साथ साझा करें।

इस प्रकार, अन्नकूट पूजा के माध्यम से भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है और प्रकृति व अन्न के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है, दिवाली के अगले दिन मनाई जाती है। इस पूजा का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा करने की कथा से जुड़ा हुआ है।

गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा

मान्यता है कि एक बार वृंदावन में इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए लोग यज्ञ कर रहे थे। भगवान कृष्ण ने यह देखकर उनसे कहा कि बारिश, फसलें, और प्रकृति की संपदा का असली कारण गोवर्धन पर्वत है, न कि इंद्र देव। इसलिए उन्हें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। गोकुलवासियों ने कृष्ण की बात मानी और इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की।

इंद्र देव इस बात पर क्रोधित हो गए और उन्होंने गोकुल पर भयंकर वर्षा शुरू कर दी। भगवान कृष्ण ने गोकुलवासियों को बचाने के लिए अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। सात दिनों तक लगातार बारिश होती रही, लेकिन कृष्ण ने सभी की रक्षा की। इस घटना के बाद लोगों ने गोवर्धन पूजा का संकल्प लिया और तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

गोवर्धन पूजा का महत्व

• प्राकृतिक संरक्षण: यह पर्व प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के महत्व को दर्शाता है।

• कृषि और उपज का सम्मान: इस दिन भगवान को अन्नकूट (कई प्रकार के पकवान) का भोग लगाया जाता है, जिससे हमें अपनी उपज और अन्न के प्रति आभार व्यक्त करने की सीख मिलती है।

• आध्यात्मिक संदेश: भगवान कृष्ण ने इस पूजा के माध्यम से सिखाया कि हमें अंधविश्वासों से बचकर अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए और प्रकृति का सम्मान करना चाहिए।

इस प्रकार, गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति, भक्ति और आत्मनिर्भरता का संदेश देती है।

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