Udaipur News : मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में संविदा कर्मचारियों का आंदोलन: प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ उग्र हुआ संघर्ष

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Udaipur News: मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में बीते कुछ दिनों से एक गंभीर संघर्ष चल रहा है। विश्वविद्यालय के स्ववित्त पोषित सलाहकार बोर्ड (SFS) के अंतर्गत कार्यरत संविदा कर्मचारी पिछले तीन दिनों से शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हैं, लेकिन प्रशासन की तानाशाही सोच और दबावपूर्ण रवैये ने अब इस आंदोलन को उग्र रूप दे दिया है।

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में SFS संविदा कर्मचारियों का आंदोलन 16 जुलाई से उग्र रूप ले चुका है। जानिए कर्मचारियों की 5 मांगें, प्रशासन की तानाशाही और अगला कदम।

5 मुख्य मांगों के साथ 14 जुलाई से शुरू हुआ धरना

विश्वविद्यालय के SFS कर्मचारी 14 जुलाई 2025 से 5 प्रमुख मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं। ये मांगे हैं:

  1. 1 जुलाई 2025 से कार्यादेश और वेतन आदेश की तत्काल पुनःजारी करना।
  2. सेवाओं को नियमित करने की प्रक्रिया की शुरुआत।
  3. भविष्य सुरक्षा जैसे EPF/ESI का लाभ।
  4. स्वास्थ्य बीमा और अवकाश की सुविधाएँ।
  5. मानवाधिकार व गरिमा के अनुरूप व्यवहार।

30 जून 2025 तक तो कर्मचारियों को कार्यादेश और वेतन आदेश मिल चुके थे, लेकिन 1 जुलाई के बाद से न तो कोई आदेश जारी किया गया और न ही वेतन।

Udaipur News : प्रशासन की चुप्पी और डराने की नीति

13 दिनों तक इंतजार करने के बाद जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो मजबूरी में संविदा कर्मचारियों को शांतिपूर्ण धरने का रास्ता अपनाना पड़ा। लेकिन 14 और 15 जुलाई को हुए धरने के बाद भी न तो कोई अधिकारी मौके पर पहुंचे और न ही किसी ने कर्मचारियों से उनकी मांगों की जानकारी ली।

इसके विपरीत, 15 जुलाई को विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान एवं मानवीकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता द्वारा एक धमकी भरा कार्यालय आदेश जारी किया गया। इस आदेश में विभागध्यक्षों को यह निर्देश दिए गए कि SFS कर्मचारी अपनी उपस्थिति दर्ज कर कार्यस्थल पर मौजूद रहें और किसी भी प्रकार की हड़ताल या विश्वविद्यालय की “गरिमा के विरुद्ध” गतिविधियों में शामिल न हों, अन्यथा उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

(ऑर्डर दिनांक: 15-07-2025 | कार्यालय आदेश क्रमांक: No. F.391/UCSSH/Estt/2025/ “3aS”)

सवाल यह है कि आदेश लागू कैसे होगा जब कर्मचारी कार्यरत ही नहीं?

यह आदेश उस स्थिति में जारी किया गया है जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्वयं 1 जुलाई 2025 के बाद से SFS कर्मचारियों का कार्यादेश और वेतन आदेश जारी नहीं किया है। ऐसे में यह आदेश कैसे वैध है?

“जब कर्मचारी कार्यरत ही नहीं हैं, तो उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का सवाल ही नहीं उठता,” यह कहना है SFS कर्मचारी संगठन के अध्यक्ष नारायण लाल सालवी का।

अब आंदोलन होगा और उग्र: कल कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन

16 जुलाई 2025 से आंदोलन को उग्र रूप दिया जाएगा। कर्मचारी अब रैली के रूप में जिला कलेक्ट्रेट पहुंचेंगे, जहाँ वे माननीय राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन जिलाधीश को सौंपेंगे। उनका उद्देश्य विश्वविद्यालय प्रशासन की तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज को लोकतांत्रिक मंच पर उठाना है।

“शिक्षा के मंदिर में जब तानाशाही जन्म लेने लगे, तो हमें आवाज़ बुलंद करनी ही होगी। हम डरने वाले नहीं हैं!” — संविदा कर्मचारी

कर्मचारियों की नाराजगी व रोष

इस पूरे प्रकरण को लेकर विश्वविद्यालय के सैकड़ों संविदा कर्मचारियों में गहरा रोष व्याप्त है। उनका कहना है कि एक ओर तो प्रशासन खुद आदेश जारी नहीं करता और दूसरी ओर धमकी देकर चुप कराने की कोशिश करता है।

🎙️ “हमने वर्षों तक विश्वविद्यालय की सेवा की है, कम वेतन में भी निष्ठा से कार्य किया है। अब यदि अधिकार मांग रहे हैं तो यह अपराध नहीं है,” — एक महिला कर्मचारी

क्या कहता है संविधान और श्रम कानून?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) के अनुसार, प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से संगठित होने और मांग उठाने का अधिकार है। संविदा कर्मचारियों का यह आंदोलन पूरी तरह लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण रहा है।

इसके बावजूद, विश्वविद्यालय द्वारा अनुशासनात्मक कार्यवाही की धमकी देना न सिर्फ अलोकतांत्रिक है बल्कि मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है।

निष्कर्ष: समाधान जरूरी है, दमन नहीं

विश्वविद्यालय प्रशासन को यह समझने की जरूरत है कि संविदा कर्मचारी भी विश्वविद्यालय की रीढ़ हैं। उन्हें नजरअंदाज कर, डराकर या धमकाकर समाधान नहीं निकलता।

जरूरत है:

  • संवाद की
  • पारदर्शिता की
  • और एक स्थायी समाधान की।

यदि यही रवैया जारी रहा, तो यह आंदोलन सिर्फ विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य स्तर तक फैल सकता है।

SFS संविदा कर्मचारी संगठन ने साफ किया है कि जब तक सभी मांगे पूरी नहीं होती, आंदोलन जारी रहेगा। प्रशासन यदि सुलह चाहता है, तो उसे धमकी नहीं, समाधान की भाषा में बात करनी होगी।

“तानाशाही नहीं, संवाद चाहिए!”

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