बंजर जमीन पर 40 लाख का चमत्कार! 5वीं पास संतोष की कहानी मिस करोगे तो पछताओगे!

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Success Story: राजस्थान के सीकर जिले की संतोष खेदड़ ने वो कर दिखाया जो बड़े-बड़े किसान सोच भी नहीं सकते। पति की मामूली कमाई से घर चलाना मुश्किल था, तो इस 5वीं पास महिला ने हल उठाया और बंजर जमीन को सोने की खान में बदल दिया। आज वे अनार, सेब, नींबू की खेती से सालाना 40 लाख रुपए कमा रही हैं और कई राष्ट्रीय व राज्य पुरस्कार अपने नाम कर चुकी हैं। उनकी कहानी हर उस शख्स के लिए प्रेरणा है जो सपने देखता है लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता। आइए जानते हैं कैसे एक आम गृहणी बनी खेती की मास्टरमाइंड!


हाइलाइट्स

  • संतोष खेदड़ ने 5 बीघा बंजर जमीन को बनाया 40 लाख सालाना का धंधा।
  • अनार, सेब, नींबू की जैविक खेती से कमाई का नया रिकॉर्ड।
  • राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कारों से नवाज़ी गईं संतोष।

पति की कमाई से नहीं चला घर, संतोष ने बदली किस्मत

सीकर के बेरी गांव की संतोष खेदड़ कभी एक साधारण गृहणी थीं। 1989 में उनकी शादी झुंझुनूं के रामकरण खेदड़ से हुई, जो होमगार्ड की नौकरी करते थे। महीने की कमाई सिर्फ ₹3000 थी, जो परिवार चलाने के लिए नाकाफी थी। संतोष ने केवल 5वीं तक पढ़ाई की थी, लेकिन खेती का जुनून उन्हें बचपन से था। 12 साल की उम्र से ही वे अपने पिता के साथ खेतों में काम करती थीं और खेती के गुर सीख चुकी थीं। शादी के बाद जब घर की हालत बिगड़ती दिखी, तो संतोष ने पति से कहा, “खेती ही हमारा सहारा बनेगी।” लेकिन चुनौती थी – उनके पास सिर्फ 5 बीघा बंजर जमीन थी, न ट्यूबवेल था, न बिजली। फिर भी, हार मानना उनके बस की बात नहीं थी।


भैंस बेची, उधार लिया – ऐसा शुरू हुआ 40 लाख का सफर

संतोष ने 2008 में खेती की शुरुआत करने का फैसला किया। पहला कदम था अनार की खेती। उस वक्त सिंदूरी अनार की डिमांड बाजार में बढ़ रही थी। उन्होंने 220 पौधे खरीदे, जिनकी कीमत ₹5500 थी। लेकिन ड्रिप सिंचाई और खेती की तैयारी के लिए ₹45,000 चाहिए थे। उनके पास इतने पैसे नहीं थे। संतोष ने अपनी इकलौती भैंस ₹25,000 में बेच दी और बाकी ₹20,000 रिश्तेदारों से उधार लिए। इस जोखिम भरे कदम से शुरू हुआ उनका सफर आज 40 लाख सालाना की कमाई तक पहुंच चुका है। संतोष कहती हैं, “शुरुआत में डर था, लेकिन मेहनत ने रंग दिखाया।”


बंजर जमीन से निकला सोना: अनार, सेब, नींबू की खेती

संतोष और उनके पति रामकरण ने सिर्फ अनार तक नहीं रुके। उन्होंने हिमाचल के हरमन सेब, कागजी नींबू, अमरूद, आम, चीकू, थाई बेर, बिल्वपत्र, किन्नू, पपीता, मौसमी, ड्रैगन फ्रूट और नागपुरी संतरे की जैविक खेती शुरू की। ड्रिप सिंचाई और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर उन्होंने 5 बीघा जमीन को हरा-भरा कर दिया। आज उनकी नर्सरी से पौधे भी बिकते हैं और फल भी, जिससे उनकी कमाई 40 लाख रुपए सालाना से ज्यादा हो गई है। उनकी मेहनत को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय और राज्य स्तर के कई पुरस्कार मिले, जिसमें कृषि मंत्रा अवॉर्ड और “कृषि वैज्ञानिक” की उपाधि शामिल है।

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