Rajasthan News Today : राजस्थान के जोधपुर में ओसियां थाना क्षेत्र में सरपंच गणेश धतरवाल ने पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए वायरलैस टावर पर चढ़कर प्रदर्शन किया। जानें पूरा मामला और विवाद की जड़।
राजस्थान के जोधपुर ज़िले के ओसियां क्षेत्र में शुक्रवार की शाम को एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने आमजन से लेकर प्रशासन तक सभी को चौंका दिया। धोलिया नगर ग्राम पंचायत के सरपंच गणेश धतरवाल ने पुलिस कार्रवाई में पक्षपात का आरोप लगाते हुए विरोध का ऐसा तरीका अपनाया जो अब सोशल मीडिया से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक चर्चा में है।
धतरवाल ने ओसियां थाने के भीतर स्थित वायरलैस ट्रांसमिशन टावर पर चढ़कर दो घंटे तक विरोध प्रदर्शन किया और खुले शब्दों में कहा कि जब तक जोधपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) खुद मौके पर नहीं आएंगे, तब तक वे नीचे नहीं उतरेंगे।
FIR दर्ज न होने से नाराज़ सरपंच का बगावती कदम
गणेश धतरवाल ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि गुरुवार को उनके साथ मारपीट हुई, लेकिन जब वे शिकायत दर्ज कराने ओसियां थाने पहुंचे, तो पुलिस ने FIR लेने से मना कर दिया। उल्टा, उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी अर्जुनराम जाट की शिकायत पर तुरंत एकतरफा कार्रवाई करते हुए उनके ही खिलाफ FIR दर्ज कर दी गई।
इससे आहत होकर सरपंच ने यह जोखिम भरा और साहसिक कदम उठाया। जैसे ही खबर फैली, स्थानीय लोगों की भीड़ जमा हो गई, और माहौल तनावपूर्ण बन गया।
वायरल हुआ वीडियो, सोशल मीडिया पर मचा हंगामा
सरपंच के टावर पर चढ़ने की घटना का वीडियो कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए कि आखिर क्यों एक जनप्रतिनिधि को अपनी आवाज़ उठाने के लिए इस तरह का रास्ता अपनाना पड़ा? क्या पुलिस प्रशासन इतना संवेदनहीन हो चुका है?
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने यह मुद्दा उठाया कि जब एक चुना हुआ प्रतिनिधि न्याय के लिए गुहार लगाते हुए इस हद तक चला जाता है, तो आम आदमी की हालत क्या होगी?
पुलिस पर पक्षपात का आरोप
सरपंच गणेशाराम धतरवाल का आरोप है कि ओसियां पुलिस राजनीतिक दबाव में आकर काम कर रही है। उन्होंने कहा, “जब मैं अपने घर जा रहा था, तभी अर्जुनराम और उसके परिवार वालों ने रास्ता रोककर मेरे साथ मारपीट की। लेकिन मेरी FIR दर्ज नहीं की गई। उल्टा, मेरी ही शिकायत की अनदेखी कर मेरे ऊपर ही मामला दर्ज कर लिया गया।”
ओसियां थानाधिकारी राजेंद्र चौधरी का कहना है कि “मारपीट की कोई लिखित रिपोर्ट नहीं मिली है, शिकायत मिलने पर जांच की जाएगी और आवश्यक कार्रवाई होगी।”
जमीन का विवाद बनी बवाल की जड़
इस पूरी घटना की जड़ एक पुराने खेती-बाड़ी के इजारे (lease) विवाद से जुड़ी बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार, सरपंच गणेशाराम धतरवाल ने पहले बासनी बड़ला क्षेत्र में एक ट्यूबवेल और खेत इजारे पर लिया था। इस बार खेत मालिक ने वह जमीन किसी और को दे दी, जिससे विवाद गहरा गया।
इजारा बदलने के बाद नए व्यक्ति को खेत में काम नहीं करने दिया गया, और दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। इसी झगड़े की पृष्ठभूमि में मारपीट और FIR का मामला सामने आया।
प्रशासन की लापरवाही या रणनीति?
यह सवाल उठना लाज़मी है कि जब एक प्रतिनिधि अपनी बात कहने के लिए वायरलैस टावर पर चढ़ने जैसा कदम उठाता है, तो क्या प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठते? क्या यह केवल एक व्यक्ति की व्यथा है या एक बड़े सिस्टम फेलियर का प्रतीक?
सरपंच के इस कदम के बाद स्थानीय पुलिस को काफी देर तक समझाइश करनी पड़ी। अंततः वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी गई और उन्हें मौके पर बुलाने का आश्वासन देकर सरपंच को नीचे उतारा गया।
SP जोधपुर की चुप्पी और प्रशासन की परेशानी
घटना के घंटों बाद तक भी जोधपुर पुलिस अधीक्षक की ओर से कोई औपचारिक बयान नहीं आया। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि यह मामला अब जोधपुर कलेक्ट्रेट और राज्य प्रशासन के उच्चाधिकारियों तक पहुंच चुका है।
यह सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि सिस्टम पर एक बड़ा सवाल है कि क्यों एक जनप्रतिनिधि को ऐसा कदम उठाना पड़ा? क्या आम आदमी की शिकायतें ऐसे ही दबा दी जाती हैं?
सरपंच प्रकरण और बीमा, योजना विवाद का संबंध
गांवों में जमीन विवाद अक्सर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, भूमि रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन, और कृषि ऋण बीमा जैसे सरकारी प्रयासों को भी प्रभावित करते हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित किसान या सरपंच यदि ऋण बीमा या योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाएं, तो उनका न्याय पाना और अधिक मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि सरकार को ज़मीन विवादों को लेकर तेज़ और पारदर्शी योजना और बीमा प्रबंधन प्रणाली विकसित करनी चाहिए।
निष्कर्ष: जब चुने हुए प्रतिनिधि को ही न्याय न मिले तो…
इस पूरे मामले ने एक बार फिर पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरपंच गणेश धतरवाल की टावर चढ़ने वाली घटना कोई साधारण विरोध नहीं है। यह उस जनता की आवाज़ है जो अब अनसुनी नहीं रहना चाहती।
प्रशासन को अब केवल जांच का आश्वासन नहीं, बल्कि तत्काल और निष्पक्ष कार्रवाई करके यह दिखाना होगा कि कानून सभी के लिए बराबर है — चाहे वो सरपंच हो या आम नागरिक।











