चित्तौड़गढ़ जिले के प्रसिद्ध श्री सांवलियाजी मंदिर में वर्षों से जमा 58 किलो अफीम को आखिरकार नारकोटिक्स विभाग ने जब्त कर लिया। गुरुवार को प्रतापगढ़ और नीमच नारकोटिक्स टीम ने मंदिर पहुंचकर करीब 4 घंटे की कार्रवाई के बाद अफीम को सीज कर लिया।
कैसे हुई कार्रवाई?
इस दौरान मंदिर मंडल और प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहे। अफीम मंदिर के गर्भगृह के नीचे बने तहखाने में रखी गई थी, जिसे अधिकारियों ने इलेक्ट्रॉनिक तराजू से तौला और अपने कब्जे में लिया। यह अफीम अब नीमच स्थित अफीम क्षारीय कारखाने को सौंपी जाएगी।
मंदिर मंडल ने लंबे समय तक विभाग से अनुरोध किया, लेकिन धार्मिक आस्था और राजनीतिक दबाव के कारण मामला लटका रहा। अंततः RTI कार्यकर्ता के हस्तक्षेप और CBI नारकोटिक्स विंग तक मामला पहुंचने के बाद विभाग ने कार्रवाई की।
अब प्रशासन ने निर्णय लिया है कि हर महीने चढ़ावे में आने वाली अफीम को पुलिस या नारकोटिक्स विभाग को सौंपा जाएगा, जिससे भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो।
चढ़ावे में क्यों आती है अफीम?
- मेवाड़ और मालवा क्षेत्र के अफीम किसान अच्छी फसल के लिए मन्नत मांगते हैं।
- फसल अच्छी होने पर लाखों रुपये के नकद चढ़ावे के साथ अफीम भी भंडार में दान कर देते हैं।
- कुछ लोग तस्करी में सफलता के लिए भी अफीम चढ़ाते हैं।
मंदिर प्रशासन क्यों कर रहा था कार्रवाई की मांग?
- मंदिर मंडल पिछले एक साल से नारकोटिक्स विभाग से संपर्क कर रहा था।
- विभाग इसे धर्म और आस्था का मामला बताकर कार्रवाई टालता रहा।
- RTI कार्यकर्ता के हस्तक्षेप के बाद मामला सुर्खियों में आया और CBI नारकोटिक्स विंग को भी पत्र लिखा गया।
- पंद्रह दिन पहले अधिकारियों ने मंदिर का निरीक्षण किया और अब अफीम को जब्त कर लिया गया।
अब हर महीने होगा हिसाब
अतिरिक्त जिला कलेक्टर प्रभा गौतम ने कहा कि अब से हर महीने चढ़ावे में आने वाली अफीम को पुलिस या नारकोटिक्स विभाग को सौंपा जाएगा, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने।
- क्या सांवलियाजी मंदिर में अफीम का चढ़ावा बंद होगा?
- क्या नारकोटिक्स विभाग अब और सख्ती बरतेगा?
- इस मामले में राजनीतिक दबाव कितना था?
निष्कर्ष:
श्री सांवलियाजी मंदिर में वर्षों से जमा 58 किलो अफीम को आखिरकार नारकोटिक्स विभाग ने अपने कब्जे में ले लिया, जिससे मंदिर प्रशासन को बड़ी राहत मिली। यह कार्रवाई इसलिए जरूरी थी क्योंकि मंदिर में चढ़ावे के रूप में अफीम जमा होना कानूनी और प्रशासनिक दोनों दृष्टिकोण से एक संवेदनशील मामला था।
यह घटना धार्मिक आस्था और कानून के बीच संतुलन बनाए रखने का एक उदाहरण है, जहां आस्था के नाम पर अवैध कार्यों को बढ़ावा देने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाए गए। यह फैसला मंदिर की पारदर्शिता और सुचारू प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।











