Udaipur News Today : SFAB सेवाप्रदाताओं की संवेदनशील अपील — वेतन रोके रखना ‘बेरहमी’ नहीं तो क्या है?

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Udaipur (राजस्थान) – मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (MLSU) में लंबे समय से कार्यरत स्ववित्त पोषित सलाहकार मंडल (SFAB) के अल्पवेतनभोगी सेवाप्रदाताओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन को एक सशक्त ज्ञापन सौंपकर ताप मापते हुए वेतन और कार्यविस्तार आदेशों में विलंब को मानवीयता का घोर हनन बताया है।

SFAB के अध्यक्ष की ओर से भेजे गए पत्र में साफ चेतावनी दी गई है कि यदि जुलाई 2025 से समय रहते कार्य विस्तार और वेतन आदेश नहीं जारी किए गए, तो कर्मियों को अग्रिम आंदोलन और प्रदर्शन करने को विवश करना पड़ेगा। 24 News Update की रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारियों ने इसे प्रशासन की हठधर्मिता और जानबूझकर प्रताड़ना करार दिया है।

Udaipur : ज्ञापन में उठाए गए मुख्य बिंदु

  1. वेतन और आदेश जारी नहीं होने पर मानसिक-सामाजिक पीड़ा:
    कर्मचारियों ने बताया है कि वे वर्षों से सेवा दे रहे हैं। मुआवजा और वेतन मांगने पर भी प्रशासन चुप्पी साधे बैठा है, जिससे आर्थिक संकट के साथ-साथ मानसिक तनाव उत्पन्न हो रहा है।
  2. निर्धारित प्रक्रियाओं का उल्लंघन:
    ज्ञापन में उल्लेख है कि प्रशासन द्वारा पहले स्वीकृति दिए जाने के बावजूद लेटर जारी नहीं किए गए, और नियमों की अवहेलना हो रही है। यह स्थिति कई कर्मचारियों को नाजुक अवस्था में ला चुकी है।
  3. प्रताड़ना की चेतावनी:
    ज्ञापन में स्पष्ट किया गया कि यदि आदेश नहीं दिए गए तो SFAB कर्मचारियों को कार्य बहिष्कार, धरना प्रदर्शन, विशेष रूप से 14 जुलाई 2025 से आंदोलन करने को विवश होना पड़ेगा।
  4. प्रशासन को जिम्मेदारी चेतावनी:
    यदि मनोवैज्ञानिक खराबी या किसी कर्मचारी द्वारा आत्मघाती कदम उठाया जाता है, तो इसके पूर्ण विधिक उत्तरदायित्व विश्वविद्यालय प्रशासन और अधिकारियों का होगा।
  5. कार्यक्षमता संकट:
    पत्र में बताया गया कि क्योंकि नियमित कर्मचारियों की संख्या घट रही है और रिक्त पदों की संख्या बढ़ती जा रही है, SFAB कर्मियों के कार्यबहिष्कार से प्रवेश, परीक्षा, परिणाम जारी करना जैसे कार्य ठप हो सकते हैं।

प्रतिक्रिया: प्रशासन और पदाधिकारी

जल्द ही प्रशासन से आधिकारिक प्रतिक्रिया मिलने की संभावना है। लेकिन ज्ञापन में लगे आरोप गंभीर हैं—वेतन निरोध, आदेश विलंब, आर्थिक व मानसिक प्रताड़ना। संभावित रूप से इसका जवाब जांच समिति निर्माण, आदेश जारी करना, और संवेदनशील संवाद से ही हो सकता है।

निष्कर्ष:

ये विवाद सिर्फ वेतन की मांग से बढ़कर विश्वविद्यालय प्रशासन की मानव-संवेगहीनता पर सवाल खड़ा कर रहा है। SFAB सेवाप्रदाता लंबे समय से बिना स्थायी आर्थिक सहारा के कार्य कर रहे हैं—और अब जब वर्क एक्सटेंशन और वेतन की मांग की जाती है तो प्रशासन विलंब और खामोशी का सहारा लेता है।

यह सिर्फ कर्मचारियों की लड़ाई नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक जिम्मेदारी का मामला है—जो सीधे विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा और व्यवहारिक न्याय की कसौटी पर खरा उतरता है। यदि इसका समाधान न निकला, तो निश्चित है कि संस्पेंड की गई सेवाएं, परिक्षाएं, रिजल्ट प्रक्रिया और शिक्षा गतिविधियां प्रभावित होंगी।

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